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कड़ाके की ठंड में भी उमड़ा जनसैलाब, भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में भक्ति और भावनाओं का ज्वार


देवेन्द्र शुक्ला पत्रकार अखण्डनगर                           अखण्डनगर/सुल्तानपुर/ श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत खानपुर पिलाई स्थित देवनगर बाजार में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर कड़ाके की ठंड भी श्रद्धालुओं की आस्था के आगे बौनी साबित हुई। कथा स्थल पर सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरा पंडाल भक्ति व श्रद्धा के वातावरण में डूबा रहा।

कथावाचक अंबिका प्रसाद चतुर्वेदी ने समुद्र मंथन प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि समुद्र मंथन केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि मानव और गृहस्थ जीवन का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि जीवन में केवल अमृत, शुभ और सुंदर ही नहीं मिलता, बल्कि विष का भी सामना करना पड़ता है। गृहस्थ जीवन को सफल और मंगलमय बनाने के लिए विष रूपी कष्टों को भी धैर्यपूर्वक स्वीकार करना पड़ता है। इसी प्रसंग में भगवान शिव द्वारा कालकूट विषपान, भगवान के मोहिनी अवतार और शिव के मोहित होने की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया।

भजन-कीर्तन के दौरान जैसे ही भक्ति की मधुर धुन गूंजी, श्रद्धा और भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। अनेक भक्त अपने स्थान पर ही खड़े होकर प्रभु नाम में लीन हो गए और भक्ति की अविरल धारा में स्वयं को भूलकर घूमने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पंडाल नहीं, साक्षात् वृंदावन सजीव हो उठा हो और हर हृदय में भगवान स्वयं विराजमान हों।

कथा में वामन अवतार प्रसंग के माध्यम से दान के अभिमान से दूर रहने का संदेश दिया गया। कथावाचक ने बताया कि राजा बलि के दान के अभिमान को भगवान ने वामन रूप धारण कर समाप्त किया। मत्स्य अवतार की कथा में सनातन संस्कृति और सभ्यता के बीजों की रक्षा का प्रसंग सुनाया गया। इसके साथ ही महाराज अंबरीश की कथा के माध्यम से एकादशी व्रत के महत्व पर प्रकाश डाला गया, जिसे व्रतों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया।

कथा के दौरान सुद्युम्न प्रसंग, राजा मांधाता, सौभरि ऋषि, ययाति प्रसंग तथा पितृभक्त परशुराम की कथाओं ने भी श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य प्रसंग पर कथा का विश्राम हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने आरती में सहभागिता की और प्रसाद ग्रहण कर श्रद्धा व संतोष के साथ अपने-अपने घरों को प्रस्थान किया।

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